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Friday, June 18, 2021

अब तो गूगल देखकर भी गीत लिख देते हैं लोगः रेखा भारद्वाज

का नाम सुनते ही उनके कई नगमे कानों में गूंजने लगते हैं। जब भी उनकी आवाज सुनते हैं, तो लगता है जैसे कहीं चमन से फूलों की खुशबू आ रही हो, या सामने कोई मासूम सा बच्चा बैठा बड़ी शोखी से मुस्कुरा रहा हो। दो और एक नैशनल अवॉर्ड जीत चुकीं रेखा हिंदी के अलावा मराठी, पंजाबी, बांग्ला और मलयालम गीत भी गाती हैं। उनसे गीत, संगीत और भाषा से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर जमील गुलरेज ने बात की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश : शादी हो या सालगिरह, हिंदी फिल्मों के कई पुराने गीत हर मौके के लिए एंथम से बन चुके हैं। धुन से ही पता लग जाता है कि विदाई है या बर्थडे। कभी लगता है कि धुन जरूरी है, कभी लगता है अल्फाज। यह चक्कर क्या है? फिल्म के गीत सिचुएशन बेस्ड होते हैं, इसलिए उसमें लिरिक्स इंपॉर्टेंट है। फिल्म एक बार देख ली तो देख ली, लेकिन नगमे आप सालों साल सुनते हैं। उनमें हमें अपनी जिंदगी का एक रंग दिखता है। एंथम सॉन्ग्स भी ऐसे ही होते हैं, लेकिन धुन उतनी ही इंपॉर्टेंट है, सुर अंदर तक जाते हैं। कई बार हम ला-ला-ला-ला करके पूरा गाना गा लेते हैं, क्योंकि धुन हमें पूरी याद होती है। दोनों सिक्के के दो पहलू हैं, जिनके बिना सिक्का पूरा नहीं होता। गीतों को जब सुर में ढाला जाता है, तो बतौर गायक, आपको ज्यादा पकी, ज्यादा मजबूत और ज्यादा बहाव वाली भाषा कौन सी लगती है? शुरू से मैं हिंदवी बोलती हूं और उसी के साथ पली-बढ़ी हूं। पिताजी उर्दू मीडियम से पढ़े थे तो मम्मी हिंदी मीडियम से पढ़ी थीं। खैर, मेरे लिए भाषा से ज्यादा जरूरी है यह जानना कि उसका असर क्या है। जो भी भाषा हो, अगर उसका मानी मेरी समझ में आ रहा है, मेरी रूह को जंचता है, साथ में धुन भी इतनी अच्छी हो कि मेरे अंदर उतरती जाए, तो मेरा गाने का वही क्राइटेरिया है। लिरिक्स हमारी भावना को भाव देते हैं, और जो रस है, वह धुन से आता है। मेरी जो असल संगीत यात्रा और अंदर की भी जो यात्रा शुरू हुई, वह 2002 में आए 'इश्का-इश्का' एल्बम से शुरू हुई। इसमें सब सूफियाना कलाम हैं, और ये सब गुलजार साहब ने लिखे। जिस वक्त विशाल ने 1993 में बुल्ले शाह को कंपोज करना शुरू किया, उन्होंने गुलजार साहब को कुछ लाइनें सुनाईं। तो गुलजार साहब ने कहा कि इसे वह लिखेंगे उस भाषा में, जिसमें हम बातचीत करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों की समझ में आए। यह हिंदवी थी, यानी जिसमें हम बात करते हैं। एक बार शंकर जयकिशन से किसी ने कहा था कि अल्फाज गाने को अमर बनाते हैं, मगर शंकर जयकिशन का मानना था कि धुन गाने को अमर बनाती है। फिर हसरत जयपुरी से फिल्म 'लव इन टोक्यो' में एक बड़ा कठिन गीत लिखाया, 'ऐ मेरी शाहे खुबां, ऐ मेरी जाने जनाना, तुम अगर पास होते हो, कोई दूसरा नहीं होता।' लेकिन यह गाना हिट हो गया, आज भी लोग इसका मतलब नहीं जानते, मगर गाते हैं, सुनते हैं। असल में यह बात पहले सवाल से ही जुड़ी है... मैं कहूंगी कि यह बहस ही गलत है। यह ईगो की बात है और हमें इसे एक्सेप्ट कर लेना चाहिए। हालांकि ऐसा ही एक बड़ा एग्जांपल यह है कि जब गुलजार साहब ने गालिब टीवी सीरियल बनाया, और जगजीत जी ने उसे गाया, तब उन्होंने जितनी सरल धुनें बनाईं, इतने अंदर उतरकर उसे गाया, उस वजह से गालिब को समझने में बहुत मदद हुई। हमने भी उसे गाना शुरू किया, और उनके मायने खोजने शुरू किए, लेकिन इतनी लेयर्स हैं कि उनके मायने सारी जिंदगी खुलते रहेंगे। जो अर्ज हमें पुराने गीतों में मिलती है, जिनमें उर्दू हो या हिंदी, हम फर्क नहीं कर पाते, वह अब नए गीतों में क्यों नहीं मिलती? या फिर यह जेनरेशन गैप है? ऐसा कहें तो हम सब एक वक्त के बाद जेनरेशन गैप से पीड़ित हो सकते हैं क्योंकि हमारी समझ अपने वक्त के हिसाब से बनी कि हम किस तरह के संगीत में पले-बढ़े, आसपास कैसा माहौल था। अब वह माहौल बदल गया है, भाषा और अभिव्यक्ति का तरीका बदल गया है तो डेफिनेटली लिरिक्स और म्यूजिक भी बदलेंगे। आजकल बहुत अच्छा लिखने वाले शायर हैं तो बहुत खराब भी हैं। ऐसा लगता है कि गूगल पर जाकर वहां से लफ्ज तुकबंदी के तौर पर ले लेते हैं। असल में यह कमी तो हमेशा रही है क्योंकि एक मीडियॉक्रिटी हमारे संस्कार में है, कल्चर में है। पहले भी हल्का लिखने वाले थे, पर अब शायद मीडियॉकर लिखने और पसंद करने वालों की तादाद बढ़ गई है। इस मीडियॉक्रिटी को जरा खुलकर समझाइए... आप देखिए, सोशल मीडिया पर लोग कुछ भी अपना गाना या ऐक्टिंग डाल देते हैं और वह वायरल हो जाता है। इसका मतलब है कि जो इन्हें पसंद करते हैं, उनमें भी एक मीडियॉक्रिटी कहीं न कहीं अंदर होगी। यंग बच्चों को लगता है कि लिखने वाला अच्छा ही लिख रहा है, अच्छा ही चल रहा है और वह भी उसे बहुत अच्छे से करते हैं, यह उनकी समझ है। रियलिटी शो में ऐसे बच्चों के मां-बाप आकर मीडियॉक्रिटी को प्रमोट करना चाहते हैं। रियलिटी शो में वे अपनी गरीबी, मजबूरी पर रोते हैं, रुलाते हैं। फिर आप क्वॉलिटी की उम्मीद नहीं कर सकते। क्वॉलिटी वर्सेस मीडियॉक्रिटी है यहां पर। नए गीतों में के बारे में कहते हैं कि ये नई जेनरेशन के लिए हैं। मगर एट द सेम टाइम, 'हमरी अटरिया पर' या फिर 'इब्ने बतूता, पहन के जूता' भी उतनी ही तेजी से पसंद किया जाता है और सुना जाता है। तो क्या गीतों में नई भाषा किसी साजिश के तहत ठूंसी जा रही है? मुझे नहीं लगता कि ऐसा है, लेकिन अब आप गधे को घोड़ा बनाना चाहेंगे तो वह नहीं बन सकता ना। गुलजार साहब अपने एक्सपीरियंस से लिखते हैं। अच्छे शायर अपने अनुभव से लिखते हैं, सिचुएशन के लिए सिर्फ किताब पढ़कर या गूगल करके नहीं लिख देते। वह कहीं न कहीं भाषा की तरफ अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। फिर भी जिसकी जो समझ है, या जिसकी जो भाषा है, वह उसी में लिखेगा, इसका कोई इलाज नहीं समझ में आता। मगर आम पब्लिक सिर्फ यंगर जेनरेशन नहीं है। हर इंसान की अपनी एक रूह है। वह अपने हिसाब से सुनना चाहता है।


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